Class 8
प्रकाश एक प्रकार की ऊर्जा है, जिसकी सहायता से हम किसी वस्तु को देख पाते हैं।
जब किसी वस्तु से निकलने वाली किरणें हमारी आँखों तक पहुँचती हैं, तब वह वस्तु हमें दिखाई देती है।
सरल शब्दों में -
जो विकिरण हमारी आँखों को संवेदित (महसूस) कर सके, उसे प्रकाश कहते हैं।
प्रकाश विद्युतचुंबकीय तरंगों (Electromagnetic Waves) का एक भाग है। इसके मुख्य तीन प्रकार होते हैं —
● इन किरणों की तरंगदैर्ध्य (Wavelength) बहुत कम होती है।
● ये हमारी आँखों से दिखाई नहीं देतीं।
● सूर्य इनका मुख्य स्रोत है।
● अधिक मात्रा में UV किरणें त्वचा और आँखों को नुकसान पहुँचा सकती हैं।
● इनका उपयोग कीटाणुओं को नष्ट करने और चिकित्सा में भी किया जाता है।
● इन किरणों की तरंगदैर्ध्य अधिक होती है।
● ये भी आँखों से दिखाई नहीं देतीं।
● इनसे ऊष्मा (Heat) प्राप्त होती है, इसलिए इन्हें ऊष्मीय किरणें भी कहते हैं।
● गर्म वस्तुओं से अवरक्त किरणें उत्सर्जित होती हैं।
● सूर्य, आग की लपटें, हीटर आदि अवरक्त किरणों के स्रोत हैं।
● इनका उपयोग रिमोट कंट्रोल, नाइट विज़न कैमरा और चिकित्सा में किया जाता है।
● यह वह प्रकाश है जिसे हमारी आँखें देख सकती हैं।
● बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी और लाल।
● इसी प्रकाश के कारण हमें आसपास की वस्तुएँ दिखाई देती हैं।
सूर्य से पराबैंगनी, अवरक्त और दृश्य — तीनों प्रकार की किरणें निकलती हैं।
आग की लपटों से मुख्य रूप से अवरक्त तथा दृश्य प्रकाश उत्सर्जित होता है।
● जब हम दर्पण में अपना चेहरा देखते हैं, तो यह प्रकाश के परावर्तन के कारण ही संभव होता है।
अर्थात् दर्पण पर पड़ने वाली किरण, वापस लौटने वाली किरण और अभिलंब (Normal) तीनों एक ही समतल में स्थित होते हैं।
अर्थात् जितने कोण पर प्रकाश दर्पण से टकराता है, उतने ही कोण पर वापस लौटता है।
∠i = ∠r
जहाँ -
i = आपतन कोण
r = परावर्तन कोण
प्रकाश की वह किरण जो किसी चमकीली सतह या दर्पण पर आकर गिरती है, उसे आपतित किरण कहते हैं।
दर्पण से टकराने वाली प्रकाश किरण को आपतित किरण कहते हैं।
दर्पण या चमकीली सतह से टकराने के बाद जो प्रकाश किरण वापस लौटती है, उसे परावर्तित किरण कहते हैं।
सरल शब्दों में —
परावर्तन के बाद वापस आने वाली प्रकाश किरण को परावर्तित किरण कहते हैं।
इस घटना को पार्श्व-परिवर्तन कहते हैं।
● यदि आप कागज पर “AMBULANCE” लिखकर दर्पण में देखें, तो वह उल्टा दिखाई देता है।
इसी कारण एम्बुलेंस पर यह शब्द उल्टा लिखा जाता है, ताकि सामने वाले वाहन के चालक को दर्पण में सही दिखाई दे।
● दर्पण ऊपर-नीचे परिवर्तन नहीं करता।
● केवल दाएँ और बाएँ दिशा का परिवर्तन दिखाई देता है।
इस प्रकार के परावर्तन को विसरित परावर्तन कहते हैं।
कारण
खुरदुरी सतह समतल नहीं होती, इसलिए प्रत्येक किरण अलग-अलग दिशा में परावर्तित होती है।
उदाहरण
● दीवार
● कागज
● सड़क
● लकड़ी की सतह
महत्वपूर्ण तथ्य
इसी प्रकार के परावर्तन के कारण हम अधिकांश वस्तुओं को देख पाते हैं, क्योंकि प्रकाश विभिन्न दिशाओं में फैलकर हमारी आँखों तक पहुँचता है।
जब प्रकाश की समानांतर किरणें किसी चिकनी, समतल एवं चमकदार सतह जैसे दर्पण पर पड़ती हैं और परावर्तन के बाद भी समानांतर रहती हैं, तब इस प्रकार के परावर्तन को नियमित परावर्तन कहते हैं।
विशेषताएँ
● यह चिकनी एवं समतल सतह पर होता है।
● परावर्तित किरणें एक निश्चित दिशा में जाती हैं।
● इससे स्पष्ट एवं साफ प्रतिबिंब बनता है।
उदाहरण
● दर्पण
● शांत जल की सतह
● चमकदार धातु की सतह
जब प्रकाश किसी वस्तु की सतह पर पड़कर वापस लौटता है, तब लौटने वाले प्रकाश को परावर्तित प्रकाश कहते हैं।
प्रकाश के इस वापस लौटने की प्रक्रिया को प्रकाश का परावर्तन कहते हैं।
जब किसी वस्तु पर प्रकाश की किरणें पड़ती हैं, तो वस्तु उन किरणों को वापस भेज देती है। यही वापस आने वाला प्रकाश परावर्तित प्रकाश कहलाता है।
महत्वपूर्ण तथ्य
● हमारी आँखें वस्तुओं को परावर्तित प्रकाश के कारण ही देख पाती हैं।
● यदि किसी वस्तु से प्रकाश परावर्तित न हो, तो वह दिखाई नहीं देगी।
यह प्रकाश वास्तव में सात रंगों से मिलकर बना होता है।
ये सात रंग हैं -
● बैंगनी (Violet)
● जामुनी / नीला-बैंगनी (Indigo)
● नीला (Blue)
● हरा (Green)
● पीला (Yellow)
● नारंगी (Orange)
● लाल (Red)
इन सात रंगों को मिलाकर वर्णक्रम (Spectrum) कहा जाता है।
जब सूर्य का श्वेत प्रकाश किसी प्रिज्म से होकर गुजरता है, तब यह
अपने सात रंगों में विभाजित हो जाता है।
इस प्रक्रिया को प्रकाश का वर्ण-विक्षेपण (Dispersion of Light) कहते हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
इंद्रधनुष सूर्य के श्वेत प्रकाश के सात रंगों से बनता है।
लाल रंग का विचलन सबसे कम तथा बैंगनी रंग का विचलन सबसे अधिक होता है।
यह प्रकाश को आँख के अंदर प्रवेश करने देता है तथा उसकी रक्षा भी करता है।
कॉर्निया के पीछे गहरे रंग की पेशीय संरचना होती है, जिसे परितारिका कहते हैं।
इसी से आँखों का रंग निर्धारित होता है।
कार्य
● आँख में प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा को नियंत्रित करना।
परितारिका के बीच में एक छोटा छिद्र होता है, जिसे पुतली कहते हैं।
कार्य
पुतली के पीछे एक पारदर्शी लेंस होता है, जो बीच में मोटा होता है।
कार्य
आँख के पीछे स्थित प्रकाश-संवेदी परत को रेटिना कहते हैं।
कार्य
महत्वपूर्ण तथ्य
इनकी सहायता से हम संसार की वस्तुओं को देख पाते हैं। इसलिए हमें अपने नेत्रों की उचित देखभाल करनी चाहिए।
नेत्रों की देखभाल के उपाय:-
इससे धूल एवं गंदगी दूर रहती है।
ऐसा करने से संक्रमण हो सकता है।
यदि धूल या कोई छोटा कण आँख में चला जाए, तो आँखों को साफ पानी से धोना चाहिए।
आँखों को जोर से नहीं मलना चाहिए।
हमें सूर्य या किसी शक्तिशाली प्रकाश स्रोत को सीधे नहीं देखना चाहिए।
इससे आँखों को नुकसान पहुँच सकता है।
बहुत पास या बहुत दूर से पढ़ना आँखों के लिए हानिकारक हो सकता है।
यदि डॉक्टर द्वारा चश्मा लगाने की सलाह दी गई हो, तो सही नंबर का चश्मा अवश्य पहनना चाहिए।
महत्वपूर्ण तथ्य
इसका आविष्कार सन् 1821 में फ्रांस के नेत्रहीन लेखक Louis Braille ने किया था।
हर पैटर्न किसी विशेष अक्षर, अक्षरों के समूह, सामान्य शब्द अथवा व्याकरणिक चिन्ह को प्रदर्शित करता है।
उपयोगिता
ब्रेल पद्धति ने नेत्रहीन व्यक्तियों को शिक्षा प्राप्त करने, लिखने-पढ़ने तथा आत्मनिर्भर बनने में अत्यंत सहायता प्रदान की है।