सूक्ष्मजीव मित्र एवं शत्रु
Class 8
सूक्ष्मजीव:
● ऐसे जीव जिन्हें हम अपनी नंगी आँखों से नहीं देख सकते और जिन्हें देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी की आवश्यकता होती है, उन्हें सूक्ष्मजीव कहा जाता है।
सूक्ष्मजीवों के प्रकार:
सूक्ष्मजीवों को मुख्यतः चार प्रमुख वर्गों में विभाजित किया गया है, जो निम्नलिखित हैं—
1. जीवाणु:
ये बहुत छोटे सूक्ष्मजीव होते हैं जिन्हें बैक्टीरिया भी कहा जाता है। ये सामान्यतः एक कोशिकीय होते हैं और हवा, मिट्टी तथा जल सभी जगह पाए जाते हैं। हालाँकि, ये नमीयुक्त स्थानों पर अधिक संख्या में मिलते हैं। इनका आकार गोल या छड़ के समान होता है। ये बहुत तेजी से विभाजन करके अपनी संख्या बढ़ाते हैं। सामान्यतः इनका प्रजनन द्विखण्डन विधि द्वारा होता है
संरचना (जीवाणु की बनावट):
जीवाणु की कोशिका के चारों ओर एक मजबूत परत होती है जिसे कोशिका भित्ति कहते हैं। यह कोशिका को सुरक्षा देती है और उसे एक निश्चित आकार भी देती है।
इस कोशिका भित्ति के अंदर जीव द्रव्य (साइटोप्लाज्म) होता है, जिसमें कुछ आवश्यक चीजें होती हैं जैसे -
● थोड़े से कोशिकांग
● संचित भोजन
● आनुवांशिक पदार्थ (DNA)
जीवाणु की खास बात यह है कि इनमें साफ-साफ दिखाई देने वाला केन्द्रक (न्यूक्लियस) नहीं होता और न ही झिल्ली वाले कोशिकांग होते हैं।
कुछ जीवाणुओं के बाहर धागे जैसी संरचनाएँ होती हैं, जिन्हें फ्लैजिला कहते हैं। इनकी मदद से जीवाणु एक स्थान से दूसरे स्थान तक गति (move) कर सकते हैं।
आर्थिक महत्व:
जीवाणुओं को आमतौर पर हानिकारक समझा जाता है, लेकिन ये हमारे लिए कई लाभदायक कार्य भी करते हैं। इसलिए इन्हें हमारे मित्र और शत्रु दोनों माना जाता है।
लाभदायक क्रियाएँ:
● दूध से दही बनाने में मदद करते हैं।
● प्रतिजैविक (एंटीबायोटिक) दवाइयों के निर्माण में उपयोगी होते हैं।
● किण्वन द्वारा विभिन्न खाद्य पदार्थों के निर्माण में काम आते हैं।
● खाद और उर्वरक बनाने में सहायक होते हैं।
● उद्योगों में एल्कोहल, सिरका और अन्य उत्पाद बनाने में उपयोग होते हैं।
हानिकारक क्रियाएँ:
● मनुष्यों में निमोनिया, टी.बी. और हैजा जैसे रोग उत्पन्न करते हैं।
● पौधों में भी रोग फैलाते हैं, जैसे नींबू का केन्कर और आलू का गलन रोग।
● भोजन को खराब करके उसे विषैला बना देते हैं।
● उपयोगी सामग्री और फर्नीचर पर उगकर उन्हें खराब कर देते हैं।
2. कवक:
कवकों को सामान्य बोलचाल की भाषा में फफूंद कहा जाता है। हम अक्सर इन्हें घरों में भोजन, अचार और चमड़े की वस्तुओं पर उगते हुए देखते हैं।
बरसात के दिनों में कूड़े-करकट पर उगने वाली छाते के आकार की संरचना भी एक प्रकार का कवक होती है।
कवक एक विशेष प्रकार के सूक्ष्मजीव हैं। पहले इन्हें पौधे माना जाता था, लेकिन अब इन्हें पौधों और जन्तुओं से अलग एक अलग समूह में रखा गया है।
संरचना:
कवकों का शरीर थैलस प्रकार का होता है। इनमें लम्बे-लम्बे धागे जैसी बेलनाकार रचनाएँ पाई जाती हैं।
इनके तन्तु एक कोशिकीय या बहुकोशिकीय हो सकते हैं। ये तन्तु आपस में उलझकर जाल जैसी संरचना बना लेते हैं।
अधिकांश कवकों में सुविकसित केन्द्रक, माइटोकॉण्ड्रिया और राइबोसोम जैसे सभी आवश्यक कोशिकांग पाए जाते हैं।
आर्थिक महत्व:
अधिकांश कवक प्राकृतिक रूप से बहुत उपयोगी होते हैं। मिट्टी में पाए जाने वाले कवक पौधों और जन्तुओं के मृत शरीर तथा बचे हुए भागों को सड़ा-गलाकर उन्हें खनिज में बदल देते हैं।
लाभदायक क्रियाएँ:
● जलेबी, खमण और डोसा जैसे खाद्य पदार्थ बनाने में खमीर नामक कवक का उपयोग होता है।
● पेनीसिलीन और स्ट्रेप्टोमाइसीन जैसी औषधियाँ कवकों से बनाई जाती हैं।
● मशरूम एक प्रकार का कवक है जिसे सब्जी के रूप में खाया जाता है।
● कई कवकों से रंग भी तैयार किए जाते हैं।
हानिकारक क्रियाएँ:
● कई कवक पौधों, जन्तुओं और मनुष्यों में रोग फैलाते हैं।
● जैसे— आलू का वार्ट रोग, गेहूँ का गेरुआ रोग और मनुष्यों में दाद व खुजली जैसे त्वचा रोग।
3. प्रोटोजोआ:
प्रोटोजोआ सूक्ष्मजीवों का एक समूह है। इस समूह के अधिकांश जीव एक कोशिकीय होते हैं और जल, मिट्टी, पौधों तथा जानवरों के शरीर में पाए जाते हैं।
संरचना:
इन जीवों की कोशिका पूरी तरह जन्तु कोशिका के समान होती है। इस समूह के जीव स्वतंत्र रूप से भी रहते हैं और कुछ अन्य जीवों के शरीर में परजीवी के रूप में भी पाए जाते हैं।
इनमें चलने-फिरने के लिए विशेष रचनाएँ होती हैं। जैसे— युग्लीना में फ्लैजिला, पैरामीशियम में सिलिया और अमीबा में कूटपाद पाए जाते हैं।
आर्थिक महत्व:
प्रोटोजोआ एककोशिकीय और सूक्ष्मदर्शी प्राणियों का समूह है। ये जीव पृथ्वी की लगभग सभी परिस्थितियों—जल, थल और वायु में पाए जाते हैं।
ये प्राणियों और पादपों के शरीर के भीतर परजीवी या सहजीवी रूप में भी रहते हैं।
लाभदायक क्रियाएँ:
● कुछ प्रोटोजोआ पर्यावरण में जैविक पदार्थों के विघटन में सहायता करते हैं।
● जल को स्वच्छ बनाए रखने में भी इनकी भूमिका होती है।
हानिकारक क्रियाएँ:
● कुछ प्रोटोजोआ मनुष्यों में रोग उत्पन्न करते हैं, जैसे मलेरिया और अमीबायसिस।
4. शैवाल:
नील-हरित शैवाल एक कोशिकीय और बहुकोशिकीय शैवालों का समूह है। इन्हें अंग्रेजी में सायनोबैक्टीरिया भी कहा जाता है।
ये सामान्यतः रुके हुए पानी में उगते हैं और वहाँ फिसलन पैदा कर देते हैं।
लक्षण:
● इन शैवालों का रंग नीला-हरा होता है।
● इनका पादप शरीर थैलस कहलाता है, जो तन्तुवत और बेलनाकार होता है।
● इनके थैलस के चारों ओर म्यूसीलेज का चिपचिपा आवरण होता है।
आर्थिक महत्व:
प्रागैतिहासिक काल से ही मानव शैवालों का विभिन्न रूपों में उपयोग करता रहा है। मानव के बौद्धिक विकास और बढ़ती आवश्यकताओं के साथ शैवालों का महत्व भी बढ़ता गया है।
शैवालों के लाभप्रद उपयोग:
शोधों से यह स्पष्ट हुआ है कि शैवाल भोजन, औषधि, कृषि और उद्योग जैसे कई क्षेत्रों में अत्यंत उपयोगी हैं।
1. भोजन के रूप में:
शैवाल की कई जातियों का उपयोग भोजन के रूप में किया जाता है।
2. चारे के रूप में:
नॉर्वे, फ्रांस, डेनमार्क, अमेरिका और न्यूजीलैंड जैसे देशों में समुद्री शैवालों का उपयोग पशुओं के चारे के रूप में किया जाता है।
3. उद्योगों में उपयोग:
शैवालों का उद्योग के क्षेत्र में भी बहुत महत्व है।
कुछ अलग: विषाणु भी सूक्ष्मजीव होते हैं। ये जीवाणुओं से भी अधिक सूक्ष्म होते हैं। ये स्वतंत्र रूप से निर्जीव होते हैं, परंतु किसी सजीव के शरीर में प्रवेश करते ही सजीवों जैसा व्यवहार करने लगते हैं। इनका आकार एक जीवाणु के हजारोंवें भाग के बराबर होता है।
सूक्ष्मजीवों से होने वाले सामान्य रोग:
सूक्ष्मजीवों के कारण होने वाले वे रोग, जो एक संक्रमित व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति में वायु, जल, भोजन या शारीरिक संपर्क के माध्यम से फैलते हैं, उन्हें संचरणीय रोग कहा जाता है।
ऐसे रोगों के उदाहरण हैं— हैजा, सामान्य सर्दी-जुकाम, चिकनपॉक्स और क्षय रोग।
1. फ्लू जैसा इन्फ्लुएंजा एक आम बीमारी है।
2. सर्दी जुकाम
3. रेबीज
4. खसरा
1. फ्लू जैसा इन्फ्लुएंजा एक आम बीमारी है
फ्लू एक आम बीमारी है। इन्फ्लुएंजा एक प्रकार का वायरस है, जो हमारे श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है और यह एक अत्यंत संक्रामक रोग है।
फ्लू के तीन प्रकार होते हैं— A, B और C। इनमें से A और B प्रकार इन्फ्लुएंजा का मुख्य कारण बनते हैं, जबकि C प्रकार भी फ्लू के लक्षण दिखाता है, लेकिन यह कम देखने को मिलता है।
2. सर्दी-जुकाम
यह ऊपरी श्वसन तंत्र का एक आसानी से फैलने वाला संक्रामक रोग है, जो मुख्य रूप से नाक को प्रभावित करता है।
इसके प्रमुख लक्षणों में खांसी, गले में खराश, नाक से स्राव (राइनोरिया) और बुखार शामिल हैं।
आमतौर पर इसके लक्षण 7 से 10 दिनों में ठीक हो जाते हैं, लेकिन कुछ मामलों में ये 3 सप्ताह तक भी बने रह सकते हैं।
3. रेबीज:
रेबीज एक गंभीर बीमारी है, जो रेबीज नामक विषाणु से होती है। यह मुख्य रूप से पशुओं की बीमारी है, लेकिन संक्रमित पशुओं के काटने से मनुष्यों में भी फैल जाती है।
यह विषाणु संक्रमित पशुओं की लार में पाया जाता है। जब ऐसा पशु किसी मनुष्य को काटता है, तो यह विषाणु शरीर में प्रवेश कर जाता है। कभी-कभी संक्रमित लार के संपर्क से, जैसे आँख, मुँह या खुले घाव के जरिए भी संक्रमण हो सकता है।
इस बीमारी के लक्षण मनुष्यों में कुछ महीनों से लेकर कई वर्षों बाद तक दिखाई दे सकते हैं, लेकिन सामान्यतः ये 1 से 3 महीनों के भीतर दिखने लगते हैं।
शुरुआती लक्षणों में आलस्य, अधिक नींद आना और चिड़चिड़ापन शामिल हैं। यदि ये लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगें, तो स्थिति बहुत गंभीर हो जाती है और व्यक्ति का बचना मुश्किल हो सकता है।
इसलिए यदि किसी जंगली या पालतू पशु के काटने की घटना हो, तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लेकर इलाज करवाना बहुत जरूरी होता है।
4. खसरा:
खसरा एक अत्यधिक संक्रामक वायरल बीमारी है। यह रोग काफी असुविधाजनक होता है और कभी-कभी गंभीर जटिलताओं का कारण भी बन सकता है।
टीकाकरण के प्रभाव के कारण अब कई देशों में यह बीमारी कम देखने को मिलती है।
खसरा किसी भी व्यक्ति को हो सकता है, यदि उसे टीका नहीं लगाया गया हो या उसे पहले यह रोग न हुआ हो। हालांकि यह छोटे बच्चों में अधिक सामान्य है।
आमतौर पर यह संक्रमण 7 से 10 दिनों में ठीक हो जाता है।
कुछ अलग: एडवर्ड जेनर (Edward Jenner) ने चेचक के टीके का आविष्कार वर्ष 1796 ईस्वी में किया था। उन्हें टीकाकरण का जनक भी कहा जाता है।
सूक्ष्मजीवों का आवास:
सरल शब्दों में, सूक्ष्मजीव हर जगह पाए जाते हैं। ये हवा, मिट्टी, जल, भोजन आदि सभी स्थानों पर मौजूद होते हैं, हालांकि कुछ स्थानों पर इनकी संख्या अधिक होती है।
सूक्ष्मजीव विभिन्न परिस्थितियों में जीवित रह सकते हैं। ये बर्फीले क्षेत्रों से लेकर गर्म स्रोतों तक हर जगह पाए जाते हैं। इसके अलावा ये मरुस्थल, दलदल तथा मनुष्यों सहित अन्य जीवों के शरीर के अंदर भी रहते हैं।
अमीबा ऐसा सूक्ष्मजीव है जो अकेले रह सकता है, जबकि कवक और जीवाणु सामान्यतः समूह में रहते हैं।
लाभदायक सूक्ष्मजीव:
1. पर्यावरण को स्वच्छ बनाने में:
सूक्ष्मजीव सब्जियों के छिलके, जंतुओं के अवशेष और उनकी विष्ठा जैसे कार्बनिक पदार्थों का अपघटन करके उन्हें हानिरहित पदार्थों में बदल देते हैं। इससे पर्यावरण स्वच्छ बना रहता है।
2. दही एवं ब्रेड बनाने में:
दूध से दही बनाने में लैक्टोबैसिलस नामक जीवाणु सहायता करते हैं। ये दूध में वृद्धि करके उसे दही में बदल देते हैं।
3. बेकिंग उद्योग में:
यीस्ट का उपयोग बेकिंग उद्योग में ब्रेड, पेस्ट्री और केक बनाने के लिए किया जाता है।
सूक्ष्मजीवों का वाणिज्यिक उपयोग:
एल्कोहल, शराब एवं एसिटिक एसिड के उत्पादन में:
सूक्ष्मजीवों का उपयोग एल्कोहल, शराब और एसिटिक एसिड बनाने में किया जाता है। जौ, गेहूँ, चावल तथा फलों के रस में मौजूद प्राकृतिक शर्करा से यीस्ट की सहायता से एल्कोहल और शराब तैयार की जाती है।
1. दूध से दही बनना:
दूध से दही बनाने के लिए उसमें थोड़ा दही मिलाया जाता है, जिसमें लैक्टोबैसिलस नामक जीवाणु पाए जाते हैं। ये जीवाणु पूरे दूध को दही में बदल देते हैं। इसके अलावा सूक्ष्मजीव ब्रेड, केक, पनीर और अचार जैसे खाद्य पदार्थों के निर्माण में भी सहायक होते हैं।
2. औषधीय उपयोग:
बीमार होने पर डॉक्टर जो प्रतिजैविक (एंटीबायोटिक) दवाइयाँ देते हैं, वे सूक्ष्मजीवों से प्राप्त होती हैं। ये दवाइयाँ शरीर में रोग पैदा करने वाले सूक्ष्मजीवों को नष्ट करती हैं या उनकी वृद्धि को रोकती हैं।
3. अल्कोहल या शराब का निर्माण
आइए करके सीखते हैं
● सबसे पहले 500 mL का एक बीकर लें और उसमें लगभग तीन-चौथाई भाग तक जल भरें।
● अब उसमें 2 से 3 चम्मच चीनी अच्छी तरह घोल दें।
● इसके बाद मिश्रण में 1 से 2 चम्मच यीस्ट पाउडर डालें।
● बीकर को ढककर 4 से 5 घंटे तक किसी गर्म स्थान पर रख दें।
● कुछ समय बाद घोल को सूँघकर देखें। उसमें अल्कोहल जैसी गंध महसूस होगी।
यह गंध चीनी के अल्कोहल में परिवर्तित होने के कारण उत्पन्न होती है। चीनी के अल्कोहल में बदलने की इस प्रक्रिया को किण्वन (Fermentation) कहा जाता है।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक लुई पाश्चर (Louis Pasteur) ने सर्वप्रथम वर्ष 1857 ई. में किण्वन प्रक्रिया की खोज की थी।
पेनिसिलिन:
बीमार पड़ने पर डॉक्टर कभी-कभी पेनिसिलिन का इंजेक्शन देते हैं। पेनिसिलिन एक एंटीबायोटिक औषधि है, जो बैक्टीरिया को नष्ट करने का कार्य करती है।
सन् 1929 में अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने फफूँद से पेनिसिलिन की खोज की। उन्होंने इसे पेनिसिलियम नोटैटम नामक कवक से प्राप्त किया था। यह खोज चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
पेनिसिलिन एक ऐसा एंटीबायोटिक है जिसका उत्पादन प्राकृतिक रूप से नीले रंग की फफूँद द्वारा होता है। इसका उपयोग विभिन्न जीवाणुजनित संक्रमणों के उपचार और उनकी रोकथाम के लिए किया जाता है।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पेनिसिलिन का उपयोग बड़े स्तर पर किया गया, जिससे अनेक लोगों की जान बचाई जा सकी।
मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि:
कुछ जीवाणु और नीले-हरे शैवाल वायुमण्डलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करने में सक्षम होते हैं।
पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए मिट्टी में पोषक तत्त्वों का पर्याप्त और संतुलित मात्रा में होना आवश्यक होता है। मिट्टी की इसी क्षमता को मृदा उर्वरता कहा जाता है।
पर्यावरण का शुद्धिकरण:
सूक्ष्मजीवों की सहायता से पर्यावरण को स्वच्छ और शुद्ध बनाया जा सकता है। पर्यावरण की शुद्धता पर ही भावी पीढ़ी का बेहतर जीवन और अच्छा स्वास्थ्य निर्भर करता है।
जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों की रक्षा करना हमारे लिए बहुत आवश्यक है। प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम एक पेड़ अवश्य लगाना चाहिए, ताकि वातावरण स्वच्छ और शुद्ध बना रहे।
इससे आने वाली पीढ़ियों का स्वास्थ्य बेहतर रहेगा और वे अनेक रोगों से सुरक्षित रह सकेंगी।
मनुष्य में रोगकारक सूक्ष्मजीव:
सूक्ष्मजीव श्वास, पेय जल और भोजन के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं।
हैजा, सर्दी-जुकाम, चिकनपॉक्स और क्षय रोग संचरणीय रोगों के प्रमुख उदाहरण हैं।
उदाहरण के लिए, जब जुकाम से पीड़ित व्यक्ति छींकता है, तो उसके साथ अनेक रोगकारक वायरस वायु में फैल जाते हैं। ये वायरस किसी स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में श्वास के साथ प्रवेश करके उसे भी बीमार कर सकते हैं।
जंतुओं में रोगकारक जीवाणु:
अनेक सूक्ष्मजीव जंतुओं में भी रोग उत्पन्न करते हैं। ऐसे सूक्ष्मजीवों को रोगकारक जीव कहा जाता है, क्योंकि इनके कारण कई प्रकार की बीमारियाँ फैलती हैं।
इनमें विषाणु, जीवाणु, कवक और परजीवी आदि शामिल होते हैं। ये मनुष्य, जंतुओं, पेड़-पौधों तथा अन्य सूक्ष्मजीवों को भी संक्रमित कर सकते हैं।
मनुष्यों में इन जीवों द्वारा होने वाले रोगों को रोगजनक रोग कहा जाता है।
एन्थ्रेक्स मनुष्यों एवं मवेशियों में पाया जाने वाला एक घातक रोग है, जो जीवाणुओं द्वारा होता है।
कुछ अलग: रॉबर्ट कॉख (Robert Koch) ने सन 1876 में बैसिलस एन्थ्रैसिस नामक जीवाणु की खोज की, जो एन्थ्रेक्स रोग का कारक है।
पौधों में रोगकारक जीवाणु:
कुछ जीवाणु पौधों में विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं। ये जीवाणु पौधों की पत्तियों, तनों, जड़ों और फलों को प्रभावित करके उनकी वृद्धि और उत्पादन को नुकसान पहुँचाते हैं।
रोगकारक जीवाणु जल, वायु, मिट्टी, कीटों तथा संक्रमित बीजों के माध्यम से एक पौधे से दूसरे पौधे तक फैल सकते हैं।
इनके कारण पौधों की पत्तियाँ पीली पड़ना, धब्बे बनना, सड़न होना और पौधों का सूख जाना जैसी समस्याएँ दिखाई देती हैं।
नींबू का कैंकर, आलू का गलन रोग और धान के कुछ रोग जीवाणुओं के कारण होने वाले प्रमुख पौध रोग हैं।
खाद्य परिरक्षण:
खाद्य पदार्थों को खराब होने से बचाने के लिए परिरक्षकों, नमक और खाद्य तेल का उपयोग किया जाता है। ये सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को रोकने में सहायता करते हैं।
सोडियम बेंजोएट और सोडियम मेटाबाइसल्फाइट सामान्य परिरक्षक हैं।
नमक द्वारा मांस, मछली, आम, आँवला और इमली जैसे खाद्य पदार्थों का परिरक्षण किया जाता है।
खाद्य परिरक्षण के सामान्य तरीके:
1, निर्जलीकरण:
इस विधि में खाद्य पदार्थों से जल निकाल दिया जाता है।
उदाहरण के लिए, अनाज और दालों की नमी हटाने के लिए उन्हें धूप में सुखाया जाता है।
2. उबालकर:
द्रव खाद्य पदार्थों को उबालकर उनमें मौजूद सूक्ष्मजीवों को नष्ट किया जाता है। जैसे— दूध और पानी।
3. रसायनों का उपयोग करके:
जो पदार्थ खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखने में सहायता करते हैं, उन्हें परिरक्षक कहा जाता है।
सोडियम बेंजोएट और पोटैशियम मेटाबाइसल्फाइट का उपयोग शरबत, स्क्वैश और कैचअप आदि के परिरक्षण में किया जाता है।
4. नमक, शक्कर, तेल और सिरके का उपयोग करके:
माँस, अचार, जैम, जैली और सब्जियों के परिरक्षण में नमक, शक्कर, तेल और सिरके का उपयोग किया जाता है।
तेल एवं सिरके द्वारा परिरक्षण:
परिरक्षण में चीनी और नमक की तुलना में सिरका अधिक लाभदायक माना जाता है। सिरका सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को रोकने का कार्य करता है। लगभग 2 प्रतिशत सिरका (एसिटिक अम्ल) खाद्य पदार्थों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में सहायक होता है।
1. तेल:
कुछ खाद्य पदार्थों, विशेषकर अचार में, तेल सूक्ष्मजीवों के प्रतिरोधक के रूप में कार्य करता है। तेल खाद्य पदार्थों की सतह पर एक परत बना देता है, जिससे हवा और नमी सीधे अंदर नहीं पहुँच पाती।
इसके कारण सूक्ष्मजीवों की वृद्धि रुक जाती है और खाद्य पदार्थ लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं। इसलिए अचार जैसे पदार्थों के परिरक्षण में तेल का विशेष महत्व होता है।
2. गर्म एवं ठंडा करना:
दूध को उबालने पर उसमें उपस्थित अनेक सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं। गर्म करने से हानिकारक जीवाणुओं की वृद्धि रुक जाती है और दूध अधिक सुरक्षित हो जाता है।
इसी प्रकार खाद्य पदार्थों को ठंडा रखने से भी सूक्ष्मजीवों की वृद्धि धीमी हो जाती है, जिससे वे जल्दी खराब नहीं होते।
नाइट्रोजन स्थिरीकरण:
राइजोबियम जीवाणु दलहनी पौधों की जड़ों में पाए जाते हैं और नाइट्रोजन स्थिरीकरण में सहायता करते हैं। पौधे नाइट्रोजन को सीधे वायुमण्डल से ग्रहण नहीं कर सकते, इसलिए वे इसे नाइट्रेट (NO₃) और नाइट्राइट (NO₂) के रूप में ग्रहण करते हैं।
यौगिकों के रूप में उपस्थित नाइट्रोजन को स्थिर नाइट्रोजन कहा जाता है। वायुमण्डल में उपस्थित मुक्त नाइट्रोजन गैस को नाइट्रोजन के उपयोगी यौगिकों में बदलने की प्रक्रिया को नाइट्रोजन स्थिरीकरण कहा जाता है।
यह प्रक्रिया मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और पौधों की वृद्धि में सहायक होती है।
नाइट्रोजन चक्र:
नाइट्रोजन सभी सजीवों का एक आवश्यक संघटक है। यह प्रोटीन, पर्णहरित (क्लोरोफिल), न्यूक्लिक अम्ल तथा विटामिनों में उपस्थित होता है।
पौधों में विभिन्न विधियों द्वारा वायुमण्डल की स्वतंत्र नाइट्रोजन का नाइट्रोजनीय यौगिकों के रूप में स्थिरीकरण तथा उनके पुनः स्वतंत्र नाइट्रोजन में परिवर्तित होने की निरंतर प्रक्रिया को नाइट्रोजन चक्र (नाइट्रोजन साइकिल) कहा जाता है।
पौधे मिट्टी से नाइट्रोजन को नाइट्रेट (NO₃) तथा नाइट्राइट (NO₂) के रूप में ग्रहण करते हैं। यह नाइट्रोजन पौधों की वृद्धि और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
जब पौधे और जन्तु मर जाते हैं, तब उनका अपघटन होता है। इस प्रक्रिया में उनमें उपस्थित नाइट्रोजन मुक्त होकर मिट्टी तथा वायुमण्डल में पहुँच जाती है। यही नाइट्रोजन बाद में पादपों द्वारा फिर से ग्रहण कर ली जाती है।
कुछ विशेष जीवाणु मिट्टी में उपस्थित नाइट्रोजन यौगिकों को नाइट्रोजन गैस में परिवर्तित कर देते हैं, जिसका निर्मोचन वायुमण्डल में होता है।
इस प्रकार वायुमण्डल की मुक्त नाइट्रोजन का उपयोगी यौगिकों में बदलकर सजीवों तक पहुँचना तथा पुनः उनसे नाइट्रोजन का मुक्त होकर वायुमण्डल में मिलना लगातार चलता रहता है। इसी निरंतर प्रक्रिया को नाइट्रोजन चक्र कहा जाता है।
इस चक्र के कारण वायुमण्डल में नाइट्रोजन की मात्रा संतुलित बनी रहती है।