Class 8
पृथ्वी का वह भाग जहाँ जीवन पाया जाता है, जैवमण्डल कहलाता है। इसमें भूमि, जल और वायु के वे सभी क्षेत्र शामिल होते हैं जहाँ जीवित प्राणी जीवित रह सकते हैं। जैवमण्डल में सूक्ष्म जीवाणुओं (बैक्टीरिया) से लेकर विशालकाय जीव-जंतु तक सभी जीव शामिल होते हैं। इसके साथ ही विभिन्न प्रकार की वनस्पतियाँ, पेड़-पौधे, मनुष्य तथा अन्य जीव-जंतु भी जैवमण्डल के महत्वपूर्ण अंग हैं।
प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए पौधों और जंतुओं का संरक्षण आवश्यक है। वनों की कटाई, प्रदूषण और शिकार के कारण कई जीव-जंतु एवं पौधों की प्रजातियाँ विलुप्त होने के खतरे में हैं। इनके संरक्षण के लिए सरकार द्वारा विशेष क्षेत्र बनाए गए हैं, जैसे -
इन संरक्षित क्षेत्रों का मुख्य उद्देश्य जीव-जंतुओं और पौधों की विभिन्न प्रजातियों को सुरक्षित रखना तथा पर्यावरण संतुलन बनाए रखना है।
वन्य जीवन, पेड़-पौधों तथा जंतु संसाधनों के संरक्षण के उद्देश्य से विशेष आरक्षित क्षेत्र बनाए गए हैं। इन क्षेत्रों में जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की विभिन्न प्रजातियों को सुरक्षित रखा जाता है ताकि प्रकृति का संतुलन बना रहे और विलुप्त होने वाले जीवों की रक्षा की जा सके।
पृथ्वी को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा गया है—
जब स्थलमंडल, जलमंडल और वायुमंडल आपस में मिलकर जीवों के रहने योग्य वातावरण बनाते हैं, तब जैवमण्डल का निर्माण होता है। इसी जैवमण्डल में सभी प्रकार के जीव-जंतु, पौधे और मनुष्य निवास करते हैं।
वन और वन्यजीवन प्रकृति की अमूल्य देन हैं। ये हमारे जीवन और पर्यावरण की मजबूत नींव हैं। यदि वन और वन्य प्राणी नष्ट या विलुप्त हो जाएँ, तो यह मानव जीवन के लिए गंभीर खतरे का संकेत है।
वन हमें शुद्ध वायु, औषधियाँ, लकड़ी तथा वर्षा प्रदान करते हैं। पेड़-पौधे पर्यावरण को संतुलित बनाए रखते हैं और अनेक जीव-जंतुओं को आश्रय देते हैं। संरक्षण के प्रयासों से पेड़-पौधों, पक्षियों तथा अन्य जीवों की विभिन्न प्रजातियाँ सुरक्षित रहती हैं और उनकी संख्या बढ़ती है।
जंगली जानवरों का संरक्षण भी अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि वे खाद्य श्रृंखला और प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि वन्यजीव सुरक्षित रहेंगे, तो हमारा पर्यावरण भी सुरक्षित और संतुलित बना रहेगा।
किसी विशेष क्षेत्र में पाए जाने वाले सभी पेड़-पौधों को वनस्पतिजात कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, किसी क्षेत्रविशेष या कालविशेष में उपस्थित सभी प्रकार की वनस्पतियों का समूह वनस्पतिजात कहलाता है। इसमें छोटे पौधों से लेकर बड़े वृक्ष तक सभी शामिल होते हैं।
इसी प्रकार, किसी विशेष क्षेत्र या समय में पाए जाने वाले सभी पशु-पक्षियों एवं जीव-जंतुओं के समूह को प्राणिजात कहा जाता है। इसमें विभिन्न प्रकार के जानवर, पक्षी, कीट-पतंगे तथा अन्य जीव सम्मिलित होते हैं।
वनस्पतिजात और प्राणिजात दोनों मिलकर पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं तथा जैव विविधता को समृद्ध बनाते हैं।
राष्ट्रीय उद्यान प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा तथा जैव विविधता के संरक्षण के लिए बनाए जाते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य वन्य जीवों, दुर्लभ एवं विलुप्त होने वाले जानवरों तथा प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा करना है।
राष्ट्रीय उद्यानों में वन्यजीव अभ्यारण्यों की तुलना में अधिक कड़े नियम लागू होते हैं। यहाँ शिकार, पेड़ों की कटाई तथा अन्य हानिकारक गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध रहता है। इन क्षेत्रों का निर्माण, स्थापना और सीमाओं का निर्धारण भारत सरकार द्वारा किया जाता है।
भारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान वर्ष 1936 में हैली राष्ट्रीय उद्यान के नाम से स्थापित किया गया था, जिसे आज Jim Corbett National Park के नाम से जाना जाता है। यह Uttarakhand में स्थित है।
वर्तमान में भारत में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मिलाकर 100 से अधिक राष्ट्रीय उद्यान हैं। Satpura National Park भारत के महत्वपूर्ण संरक्षित वनों में से एक है।
वे जंतु जिनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है और जिनके विलुप्त होने का खतरा बढ़ गया है, उन्हें संकटापन्न जंतु कहा जाता है। यदि इन जीवों का संरक्षण नहीं किया गया, तो भविष्य में ये पूरी तरह समाप्त हो सकते हैं।
वनों की कटाई, शिकार, प्रदूषण तथा प्राकृतिक आवास के नष्ट होने के कारण कई जीव संकटापन्न हो गए हैं। इनकी सुरक्षा के लिए सरकार द्वारा राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभ्यारण्य तथा आरक्षित क्षेत्र बनाए गए हैं।
उदाहरण: बाघ, बारहसिंगा हिरण, गैंडा, तेंदुआ आदि।
किसी क्षेत्र के सभी जीव-जंतु, पेड़-पौधे तथा उनके आसपास का भौतिक वातावरण मिलकर पारितंत्र का निर्माण करते हैं। दूसरे शब्दों में, जीवित और निर्जीव घटकों के बीच होने वाली परस्पर क्रियाओं से जो प्राकृतिक व्यवस्था बनती है, उसे पारितंत्र या पारिस्थितिक तंत्र कहते हैं।
प्रकृति में विभिन्न जीव समुदाय एक-दूसरे के साथ तथा अपने भौतिक पर्यावरण के साथ मिलकर कार्य करते हैं। ये सभी मिलकर एक पारिस्थितिक इकाई का निर्माण करते हैं, जिसे पारितंत्र कहा जाता है।
“पारितंत्र” या “पारिस्थितिक तंत्र” शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम वर्ष 1935 में ए. जी. टैन्सले द्वारा किया गया था।
एक पारितंत्र प्रकृति की क्रियात्मक इकाई है, जिसमें जैविक घटक (पेड़-पौधे, जीव-जंतु, सूक्ष्मजीव आदि) तथा अजैविक घटक (जल, वायु, मिट्टी, सूर्य का प्रकाश आदि) आपस में जटिल संबंध स्थापित करते हैं।
उदाहरण: तालाब पारितंत्र का एक उत्तम उदाहरण है, जहाँ जल, मछलियाँ, पौधे, कीट तथा अन्य जीव एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं।
प्रवास का अर्थ है एक स्थान को छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर जाकर बसना। मानव प्राचीन काल से ही प्रवास करता रहा है। प्रारंभिक समय में आदिमानव भोजन, पानी, शिकार और सुरक्षा की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमता रहता था तथा घुमंतू जीवन व्यतीत करता था।
भोजन, आराम और सुरक्षा की आवश्यकता के कारण मानव का प्रवास निरंतर चलता रहा। उस समय यातायात के साधनों के अभाव में प्रवास सीमित था, लेकिन औद्योगीकरण और यातायात के विकास ने मानव की गतिशीलता को सरल और तेज बना दिया।
प्रवास जनसंख्या परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण आधार है। इसके कारण सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिवर्तन होते हैं। किसी भी समाज की जनसंख्या मुख्य रूप से तीन आधारों पर बदलती है -
जन्म और मृत्यु जैविक कारक हैं, जबकि प्रवास एक सामाजिक कारक है, जो आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है।
“अपने स्वाभाविक निवास स्थान को छोड़कर किसी अन्य स्थान पर जाना प्रवास कहलाता है।”
वनोन्मूलन का अर्थ है वनों के क्षेत्रों में पेड़ों को बड़े पैमाने पर काटना या जलाना। इसके पीछे कई कारण होते हैं। पेड़ों से प्राप्त लकड़ी और कोयले का उपयोग मनुष्य विभिन्न कार्यों में करता है। इसके अलावा, वन क्षेत्रों को साफ करके कृषि, चरागाह, घरों तथा कारखानों के निर्माण के लिए भूमि प्राप्त की जाती है।
पेड़ों की लगातार कटाई और पुनः वृक्षारोपण न होने के कारण प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं, जिससे जैव विविधता को भारी नुकसान पहुँच रहा है। इसके परिणामस्वरूप वातावरण में शुष्कता बढ़ती है और कई क्षेत्र धीरे-धीरे बंजर भूमि में बदल जाते हैं।
वनोन्मूलन के मुख्य कारणों में जनसंख्या वृद्धि, कृषि हेतु भूमि की आवश्यकता, फर्नीचर निर्माण, ईंधन के रूप में लकड़ी का उपयोग, कमजोर वन प्रबंधन तथा पर्यावरण संबंधी कानूनों का सही पालन न होना शामिल है।
वनोन्मूलन के कारण जलवायु परिवर्तन, मरुस्थलीकरण, जीव-जंतुओं के आवास का विनाश तथा लोगों का विस्थापन जैसी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
पृथ्वी पर पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए वनों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। मानव सहित समस्त जीव-जंतुओं का अस्तित्व वनों पर ही निर्भर करता है। यदि वनों की अंधाधुंध कटाई जारी रही और पर्यावरण संतुलन पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में अनेक गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए वनोन्मूलन को रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिए -
वनोन्मूलन के कारण जंगलों में रहने वाले अनेक जीव-जंतु बेघर हो जाते हैं। उनके प्राकृतिक आवास नष्ट होने से कई प्रजातियाँ विलुप्त होने लगती हैं।
पेड़ों की संख्या कम होने से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे पृथ्वी का तापमान बढ़ने लगता है और सूखा जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
वनों की कटाई से पृथ्वी का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ जाता है। मिट्टी की नमी कम हो जाती है तथा उपजाऊ भूमि धीरे-धीरे बंजर और रेगिस्तान में बदलने लगती है। इस प्रक्रिया को मरुस्थलीकरण कहा जाता है।
वनोन्मूलन के कारण वर्षा का संतुलन भी प्रभावित होता है, जिससे बाढ़, सूखा तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं की संभावना बढ़ जाती है।
पुनर्वनरोपण का अर्थ है कटे हुए या नष्ट हो चुके वनों के स्थान पर पुनः नए पेड़ लगाना। जब पेड़ों की कटाई, आग लगने या अन्य प्राकृतिक कारणों से वन नष्ट हो जाते हैं, तब उनकी जगह नए वृक्ष लगाए जाते हैं। इस प्रक्रिया को पुनर्वनरोपण कहते हैं।
पुनर्वनरोपण से पर्यावरण का संतुलन बना रहता है, मिट्टी का संरक्षण होता है तथा जीव-जंतुओं को पुनः प्राकृतिक आवास प्राप्त होता है। यह प्रकृति और मानव जीवन दोनों के लिए अत्यंत आवश्यक है।