फसल उत्पादन एवं प्रबंध

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कृषि पद्धतियाँ (Agricultural Practices)

लगभग 10,000 ईसा पूर्व (E.पू.) हिम युग का अंत हुआ। इसके बाद धीरे-धीरे मनुष्यों ने एक स्थान पर रहकर खेती करना शुरू किया। जनसंख्या बढ़ने के साथ लोगों की भोजन की आवश्यकता भी बढ़ने लगी। अधिक मात्रा में भोजन उत्पादन करने के लिए वैज्ञानिक और व्यवस्थित खेती की विभिन्न विधियों को अपनाया गया। इन्हीं विधियों को कृषि पद्धतियाँ कहा जाता है।

कृषि पद्धतियों में भूमि की तैयारी, बीज बोना, सिंचाई, खाद देना, फसल की सुरक्षा तथा कटाई जैसी प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं। इन पद्धतियों की सहायता से अच्छी गुणवत्ता और अधिक मात्रा में फसल प्राप्त होती है।

फसल (Crop)

जब किसी एक प्रकार के पौधे को किसी स्थान पर बड़े पैमाने पर उगाया जाता है, तो उसे फसल कहा जाता है।

उदाहरण के लिए –

●    गेहूँ

●    धान

●    मक्का

●    सब्जियाँ

●    फल

यदि किसी खेत में केवल गेहूँ उगाया जाता है, तो वह गेहूँ की फसल कहलाती है। इसी प्रकार धान, मक्का या अन्य पौधों को बड़े क्षेत्र में उगाने पर उन्हें उनकी संबंधित फसल कहा जाता है।

फसल के प्रकार (Types of Crops)

फसलों को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जाता है –

1.    खरीफ फसल

      2.    रबी फसल

1. खरीफ फसल (Kharif Crop)

जो फसलें वर्षा ऋतु में बोई जाती हैं, उन्हें खरीफ फसल कहा जाता है। इन फसलों को बढ़ने के लिए अधिक पानी और गर्म मौसम की आवश्यकता होती है।

भारत में खरीफ फसलों की बुआई सामान्यतः जून से जुलाई के बीच की जाती है तथा कटाई सितंबर से अक्टूबर तक होती है। ये फसलें मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर करती हैं।

खरीफ फसलों के उदाहरण:

●    धान

●    मक्का

●    सोयाबीन

●    कपास

●    बाजरा

खरीफ फसलें उन क्षेत्रों में अधिक अच्छी होती हैं जहाँ वर्षा पर्याप्त मात्रा में होती है। इसलिए इन्हें पानी की अधिक आवश्यकता वाली फसलें भी कहा जाता है।

खरीफ फसल

धान

धान

मक्का

मक्का

सोयाबीन

सोयाबीन

कपास

कपास

मूंगफली

मूंगफली

2. रबी फसल (Rabi Crop)

जो फसलें शीत ऋतु में बोई जाती हैं, उन्हें रबी फसल कहा जाता है। इन फसलों को उगने के लिए ठंडा मौसम तथा कम पानी की आवश्यकता होती है।

भारत में रबी फसलों की बुआई सामान्यतः अक्टूबर से नवंबर के बीच की जाती है तथा कटाई मार्च से अप्रैल तक होती है।

रबी फसलों के उदाहरण:

●    गेहूँ

●    चना

●    मटर

●    सरसों

●    जौ

रबी फसलें मुख्य रूप से शीत ऋतु में उगाई जाती हैं और इनके लिए अत्यधिक वर्षा की आवश्यकता नहीं होती। ये फसलें ठंडे वातावरण में अच्छी पैदावार देती हैं।

रबी फसलों

गेहूं

गेहूं

मटर

मटर

चना

चना

कृषि पद्धतियाँ (Agricultural Practices)

फसल उगाने के लिए किसान को समय-समय पर कई महत्वपूर्ण कार्य करने पड़ते हैं। इन सभी कार्यों को मिलाकर कृषि पद्धतियाँ कहा जाता है। अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए इन सभी चरणों को सही तरीके से करना आवश्यक होता है।

1. मिट्टी तैयार करना।

2. बुआई

3. खाद एवं उवर्रक देना

4. सिंचाई

5. खरपतवार से सुरक्षा

6. कटाई

7. भंडारण

1. मिट्टी की तैयारी (Preparation of Soil)

फसल उगाने का पहला और महत्वपूर्ण चरण मिट्टी की तैयारी है। अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए मिट्टी को अच्छी तरह तैयार करना आवश्यक होता है।

इस प्रक्रिया में किसान मिट्टी की जुताई करता है, जिससे मिट्टी भुरभुरी और मुलायम बन जाती है। जुताई करने से मिट्टी में हवा का संचार बढ़ता है तथा पौधों की जड़ों को गहराई तक फैलने में सहायता मिलती है।

मिट्टी की तैयारी के लिए किसान विभिन्न कृषि औजारों का उपयोग करता है। पहले के समय में जुताई के लिए मुख्य रूप से हल का प्रयोग किया जाता था। हल लकड़ी का बना होता था और उसके आगे लोहे की नुकीली पट्टी लगी होती थी, जिससे मिट्टी को खोदा जाता था। इसे बैलों की सहायता से चलाया जाता था।

हल

आज के समय में आधुनिक कृषि यंत्रों का उपयोग किया जाता है। मिट्टी तैयार करने के लिए कल्टीवेटर (Cultivator) का प्रयोग किया जाता है, जो ट्रैक्टर से जुड़ा होता है। इससे कम समय में बड़ी मात्रा में खेत की जुताई आसानी से हो जाती है।

कल्टीवेटर

2. बुआई (Sowing)

बुआई फसल उत्पादन का एक महत्वपूर्ण चरण है। इस प्रक्रिया में किसान अच्छे, स्वस्थ और गुणवत्तापूर्ण बीजों का चयन करता है, ताकि अच्छी उपज प्राप्त हो सके।

बीजों को उचित गहराई और सही दूरी पर मिट्टी में बोया जाता है। सही तरीके से बुआई करने से पौधों की वृद्धि अच्छी होती है और फसल की गुणवत्ता बढ़ती है।

पहले के समय में किसान बुआई के लिए हल और अन्य पारंपरिक कृषि उपकरणों का उपयोग करते थे। इन उपकरणों की सहायता से बीज मिट्टी के अंदर पहुँचाए जाते थे।

आज के समय में बुआई के लिए आधुनिक मशीनों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें सीड ड्रिल (Seed Drill) कहा जाता है। यह मशीन ट्रैक्टर से जुड़ी होती है और बीजों को समान दूरी तथा उचित गहराई पर मिट्टी में बोती है। इससे समय और मेहनत दोनों की बचत होती है तथा बीज भी सुरक्षित रहते हैं।

3. खाद एवं उर्वरक देना (Adding Manure and Fertilizers)

फसलों की अच्छी वृद्धि के लिए मिट्टी में पर्याप्त पोषक तत्व होना आवश्यक होता है। मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए उसमें जिन पदार्थों को मिलाया जाता है, उन्हें खाद और उर्वरक कहा जाता है।

खाद (Manure)

खाद प्राकृतिक पदार्थों से प्राप्त होती है। यह मुख्य रूप से गोबर, मानव अपशिष्ट तथा पौधों और जीव-जंतुओं के अवशेषों के विघटन से बनती है। खाद मिट्टी को ह्यूमस प्रदान करती है, जिससे मिट्टी अधिक उपजाऊ और भुरभुरी बनती है।

उर्वरक (Fertilizers)

उर्वरक रासायनिक पदार्थ होते हैं, जिन्हें फैक्ट्रियों में तैयार किया जाता है। ये पौधों को आवश्यक पोषक तत्व जल्दी उपलब्ध कराते हैं और फसल की वृद्धि को तेज करते हैं।

खाद और उर्वरक में अंतर

●    खाद प्राकृतिक होती है, जबकि उर्वरक रासायनिक होते हैं।

●    खाद मिट्टी को ह्यूमस प्रदान करती है, जबकि उर्वरक ह्यूमस प्रदान नहीं करते।

●    खाद मिट्टी की गुणवत्ता को लंबे समय तक बेहतर बनाती है, जबकि उर्वरकों का अधिक उपयोग मिट्टी को नुकसान पहुँचा सकता है।

खाद और उर्वरक

4. सिंचाई (Irrigation)

फसलों की अच्छी वृद्धि के लिए समय-समय पर पानी देना आवश्यक होता है। पौधों को पानी पहुँचाने की प्रक्रिया को सिंचाई कहा जाता है। किसान सिंचाई के लिए विभिन्न जल स्रोतों का उपयोग करते हैं।

सिंचाई के मुख्य स्रोत:

●    कुआँ

●    तालाब

●    नहर

●    ट्यूबवेल

●    नदी

सिंचाई की आधुनिक विधियाँ

आज के समय में पानी की बचत और बेहतर सिंचाई के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जाता है। इनमें मुख्य रूप से दो विधियाँ महत्वपूर्ण हैं:

1. ड्रिप तंत्र (Drip Irrigation)

इस विधि में पानी बूंद-बूंद करके सीधे पौधों की जड़ों तक पहुँचाया जाता है। इसलिए इसे ड्रिप तंत्र कहा जाता है।

यह विधि फलदार पौधों, बगीचों तथा वृक्षों के लिए अत्यंत उपयोगी होती है। इसमें पानी की बहुत कम बर्बादी होती है, इसलिए इसे सिंचाई की सर्वोत्तम विधि माना जाता है।

ड्रिप तंत्र के लाभ:

●    पानी की बचत होती है।

●    पौधों को आवश्यक मात्रा में पानी मिलता है।

●    मिट्टी का कटाव कम होता है।

●    फसल की वृद्धि अच्छी होती है।

ड्रिप तंत्र

2. छिड़काव तंत्र (Sprinkler Irrigation)

इस विधि में पाइपों के ऊपर घूमने वाले नोज़ल लगाए जाते हैं। जब पाइपों में पानी प्रवाहित किया जाता है, तो नोज़ल पानी को चारों ओर वर्षा की तरह छिड़कते हैं। इसलिए इसे छिड़काव तंत्र कहा जाता है।

यह विधि असमतल भूमि तथा कम पानी वाले क्षेत्रों के लिए बहुत उपयोगी होती है।

छिड़काव तंत्र के उपयोग:

●    लॉन में

●    कॉफी की खेती में

●    बगीचों में

●    असमतल खेतों में

छिड़काव तंत्र

5. खरपतवार से सुरक्षा (Protection from Weeds)

खेत में फसल के साथ कुछ अवांछित पौधे भी उग आते हैं, जिन्हें खरपतवार (Weeds) कहा जाता है। ये पौधे फसल के लिए हानिकारक होते हैं, क्योंकि ये मिट्टी से जल, पोषक तत्व, स्थान तथा सूर्य का प्रकाश प्राप्त कर लेते हैं। इससे फसल की वृद्धि प्रभावित होती है।

खरपतवार को हटाने की प्रक्रिया को निराई (Weeding) कहते हैं। खेतों में निराई करना बहुत आवश्यक होता है, ताकि फसल अच्छी तरह बढ़ सके।

खरपतवार हटाने के तरीके

किसान खरपतवार हटाने के लिए कई विधियों का उपयोग करते हैं:

1. हाथ से खरपतवार हटाना

खरपतवार को हाथ से जड़ सहित उखाड़कर हटाया जाता है। खेत की जुताई करके भी खरपतवारों को कम किया जा सकता है।

2. सही समय पर निराई

खरपतवार हटाने का सबसे अच्छा समय उनके फूल और बीज बनने से पहले होता है। इससे वे दोबारा नहीं फैलते।

3. कृषि उपकरणों का उपयोग

          खरपतवार हटाने के लिए किसान खुरपी तथा हैरो जैसे उपकरणों का उपयोग करते हैं।

4. रासायनिक विधि

        कुछ विशेष रसायनों का उपयोग करके भी खरपतवारों को नियंत्रित किया जाता है। इन्हें खरपतवारनाशी (Weedicides) कहा  जाता है।
       उदाहरण – 2,4-D

खरपतवारनाशी का छिड़काव करते समय मुँह और नाक को कपड़े से ढक लेना चाहिए, ताकि रसायनों का शरीर पर हानिकारक प्रभाव न पड़े।

रासायनिक

निराई (Weeding)

खरपतवार को हटाने की प्रक्रिया को निराई कहते हैं। निराई करने से फसल को पर्याप्त जल, पोषक तत्व, स्थान और प्रकाश मिलता है, जिससे उसकी वृद्धि अच्छी होती है।

कुछ खरपतवार विषैले भी होते हैं, जो मनुष्यों और पशुओं के लिए हानिकारक हो सकते हैं। इसलिए समय-समय पर खेतों की निराई करना आवश्यक होता है।

निराई

6. कटाई (Harvesting)

जब फसल पूरी तरह पककर तैयार हो जाती है, तब उसे खेत से काटा जाता है। इस प्रक्रिया को कटाई (Harvesting) कहा जाता है। कटाई फसल उत्पादन का एक महत्वपूर्ण चरण है।

पहले के समय में किसान फसल काटने के लिए दरांती (हंसिया) का उपयोग करते थे, लेकिन आज के समय में आधुनिक मशीनों का उपयोग किया जाता है।

हार्वेस्टर (Harvester)

फसल काटने के लिए हार्वेस्टर मशीन का उपयोग किया जाता है। यह मशीन कम समय और कम मेहनत में बड़ी मात्रा में फसल की कटाई कर देती है।

हार्वेस्टर

थ्रेशिंग (Threshing)

कटाई के बाद फसल से दानों को भूसे से अलग किया जाता है। इस प्रक्रिया को थ्रेशिंग कहते हैं।

आज के समय में थ्रेशिंग का कार्य कॉम्बाइन मशीन (Combine Machine) द्वारा किया जाता है। यह मशीन हार्वेस्टर और थ्रेशर दोनों का संयुक्त रूप होती है।

कॉम्बाइन मशीन के लाभ:

●    कटाई और थ्रेशिंग दोनों कार्य एक साथ होते हैं।

●    समय और श्रम की बचत होती है।

●    कम मेहनत में अधिक कार्य हो जाता है।

थ्रेशिंग

7. भंडारण (Storage)

फसल की कटाई के बाद उसे सुरक्षित स्थान पर रखा जाता है, ताकि वह लंबे समय तक खराब न हो। इस प्रक्रिया को भंडारण (Storage) कहा जाता है।

भंडारण के समय फसल को चूहों, कीटों, नमी तथा सूक्ष्मजीवों से बचाना बहुत आवश्यक होता है। यदि फसल को सही तरीके से संग्रहित नहीं किया जाए, तो वह खराब हो सकती है।

बीजों और अनाज को सुरक्षित रखने के लिए साफ और सूखे स्थान का उपयोग किया जाता है।

भंडारण

भंडारण के प्रकार (Types of Storage)

1. निजी भंडारण (Private Storage)

जब व्यापारी या निर्माता अपने माल को रखने के लिए स्वयं के भंडारगृह का उपयोग करते हैं, तो उसे निजी भंडारण कहा जाता है। इसका संचालन भी वे स्वयं करते हैं।

2. सार्वजनिक भंडारण (Public Storage)

यह एक स्वतंत्र भंडारण व्यवस्था होती है, जहाँ कोई भी व्यक्ति किराया देकर अपने माल को सुरक्षित रख सकता है। ऐसे भंडारगृहों को सार्वजनिक भंडारगृह कहा जाता है।

3. सहकारी भंडारण (Cooperative Storage)

इन भंडारगृहों की स्थापना सहकारी समितियों द्वारा अपने सदस्यों के लाभ के लिए की जाती है। ये कम लागत पर भंडारण की सुविधा प्रदान करते हैं।

भंडारण के कार्य (Functions of Storage)

भंडारणगृह वस्तुओं को सुरक्षित रखने और हानि कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं:

1. वस्तुओं का संग्रहण

         भंडारणगृह वस्तुओं को आवश्यकता होने तक सुरक्षित रूप से संग्रहीत रखते हैं।

2. वस्तुओं की सुरक्षा

ये वस्तुओं को गर्मी, धूल, हवा, नमी और कीटों से बचाते हैं।

3. जोखिम उठाना

         भंडारणगृह में रखी वस्तुओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी भंडारण अधिकारी की होती है।

4. मूल्य वृद्धि सेवाएँ

         कुछ भंडारणगृह वस्तुओं की सफाई, श्रेणीकरण, पैकिंग आदि का कार्य भी करते हैं, जिससे बिक्री में सुविधा होती है।

बीजों और अनाज को कीटों तथा सूक्ष्मजीवों से सुरक्षित रखने के लिए उचित भंडारण बहुत आवश्यक होता है।

जुताई (Tillage)

मिट्टी को उलटने-पलटने की प्रक्रिया को जुताई कहा जाता है। इसे भू-परिष्करण या कर्षण (Tillage) भी कहते हैं।

जुताई के दौरान भूमि की ऊपरी परत को चीरकर, पलटकर और जोतकर उसे बुवाई या पौधा-रोपण के योग्य बनाया जाता है। इस प्रक्रिया में मिट्टी को कुछ इंच गहराई तक खोदा जाता है, जिससे नीचे की मिट्टी ऊपर आ जाती है।

जब मिट्टी ऊपर आती है, तो वह वायु, वर्षा, सूर्य के प्रकाश, उष्मा और पाले जैसी प्राकृतिक शक्तियों के संपर्क में आती है। इसके कारण मिट्टी भुरभुरी और उपजाऊ बन जाती है, जिससे पौधों की जड़ें आसानी से फैल पाती हैं।

जुताई के लाभ:

●    मिट्टी भुरभुरी और मुलायम बनती है।

●    मिट्टी में वायु का संचार बढ़ता है।

●    पौधों की जड़ें अच्छी तरह विकसित होती हैं।

●    मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है।

●    खरपतवार नियंत्रण में सहायता मिलती है।

हल (Plough)

प्राचीन समय में खेतों की जुताई के लिए मुख्य रूप से हल का उपयोग किया जाता था। हल एक महत्वपूर्ण कृषि यंत्र है, जिसकी सहायता से खेत की मिट्टी को जोता और पलटा जाता है। बीज बोने से पहले भूमि को तैयार करने में हल का विशेष महत्व होता है।

कृषि में उपयोग होने वाले औजारों में हल सबसे प्राचीन उपकरणों में से एक माना जाता है। इतिहास के अनुसार, हल का प्रयोग बहुत पुराने समय से विभिन्न रूपों में किया जाता रहा है।

हल की सहायता से मिट्टी की ऊपरी सतह उलट जाती है, जिससे नीचे मौजूद पोषक तत्व ऊपर आ जाते हैं। साथ ही खरपतवार और फसलों के अवशेष मिट्टी में दब जाते हैं और धीरे-धीरे सड़कर खाद में बदल जाते हैं।

जुताई करने से मिट्टी में वायु का प्रवेश बढ़ता है, जिससे मिट्टी की नमी बनाए रखने की क्षमता भी बढ़ जाती है। इससे पौधों की वृद्धि बेहतर होती है और फसल की उपज में वृद्धि होती है।

हल

कुदाली (Hoe)

कुदाली खेती-बाड़ी में उपयोग किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण उपकरण है। इसका उपयोग मुख्य रूप से खरपतवार निकालने, मिट्टी खोदने, गड्ढा बनाने तथा नालियाँ तैयार करने के लिए किया जाता है।

कुदाली की सहायता से किसान मिट्टी को आसानी से खोद और पलट सकते हैं। यह खेत की सफाई और पौधों के आसपास की मिट्टी को ढीला करने में भी उपयोगी होती है।

कुदाली में लोहे की बनी एक चौड़ी फाल (ब्लेड) लगी होती है, जिसके साथ लकड़ी का लंबा हत्था जुड़ा रहता है। किसान इसे हाथ से पकड़कर उपयोग करते हैं।

कुदाली

कल्टीवेटर (Cultivator)

कल्टीवेटर एक आधुनिक कृषि यंत्र है, जिसे ट्रैक्टर से जोड़कर खेत की जुताई के लिए उपयोग किया जाता है। यह लोहे का बना होता है और इसमें कई हल जैसी नुकीली आकृतियाँ लगी होती हैं।

कल्टीवेटर की सहायता से मिट्टी को जल्दी और आसानी से जोता जा सकता है। इसके उपयोग से कम समय में अधिक खेत की जुताई हो जाती है तथा किसानों के श्रम और समय दोनों की बचत होती है।

आधुनिक खेती में कल्टीवेटर का उपयोग बहुत अधिक किया जाता है, क्योंकि यह पारंपरिक हल की तुलना में अधिक तेज और सुविधाजनक होता है।

बुआई (Sowing)

बुआई फसल उत्पादन का सबसे महत्वपूर्ण चरण है। इस प्रक्रिया में अच्छे और स्वस्थ बीजों को उचित गहराई तथा सही दूरी पर मिट्टी में बोया जाता है।

अच्छी बुआई से पौधों की वृद्धि बेहतर होती है और फसल की उपज बढ़ती है। इसलिए किसान हमेशा उत्तम गुणवत्ता वाले बीजों का चयन करते हैं।

खाद एवं उर्वरक मिलाना (Adding Manure and Fertilizers)

फसलों की अच्छी वृद्धि और मिट्टी में पोषक तत्वों का स्तर बनाए रखने के लिए खेतों में खाद एवं उर्वरक मिलाए जाते हैं। ये पौधों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करते हैं, जिससे फसल की उपज बढ़ती है।

उर्वरक ऐसे रासायनिक पदार्थ होते हैं, जो पौधों की वृद्धि में सहायता करते हैं। ये पानी में जल्दी घुल जाते हैं और मिट्टी में मिलाकर या पत्तियों पर छिड़काव करके उपयोग किए जाते हैं। पौधे इन्हें अपनी जड़ों तथा पत्तियों के माध्यम से अवशोषित कर लेते हैं।

उर्वरक पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की तुरंत पूर्ति करते हैं, लेकिन इनके कुछ दुष्परिणाम भी होते हैं। अधिक मात्रा में उपयोग करने पर ये मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं। सिंचाई के बाद ये रसायन पानी के साथ भूमि के अंदर पहुँचकर भू-जल को दूषित कर सकते हैं। साथ ही, ये मिट्टी में रहने वाले लाभदायक जीवाणुओं और सूक्ष्मजीवों के लिए भी हानिकारक होते हैं।

इसी कारण आजकल रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैविक खाद का उपयोग अधिक लोकप्रिय हो रहा है। जैविक खाद मिट्टी को ह्यूमस प्रदान करती है और उसकी उर्वरता बनाए रखने में सहायता करती है।

भारत में रासायनिक उर्वरकों का सबसे अधिक उपयोग पंजाब राज्य में किया जाता है। उर्वरकों का प्रयोग हमेशा संतुलित और सीमित मात्रा में करना चाहिए।

कम्पोस्टिंग (Composting)

रसोईघर के अपशिष्ट, पौधों के अवशेष तथा जंतु अपशिष्टों को सड़ाकर खाद में बदलने की प्रक्रिया को कम्पोस्टिंग कहा जाता है।

इस प्रक्रिया से प्राप्त खाद प्राकृतिक होती है और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में सहायता करती है। कम्पोस्ट खाद मिट्टी को ह्यूमस प्रदान करती है, जिससे फसल की वृद्धि अच्छी होती है।

वर्मीकम्पोस्टिंग (Vermicomposting)

रसोईघर के कचरे तथा जैविक पदार्थों को केंचुओं, विशेष रूप से लाल केंचुओं, की सहायता से खाद में बदलने की प्रक्रिया को वर्मीकम्पोस्टिंग कहा जाता है।

इस विधि से तैयार खाद को वर्मीकम्पोस्ट कहते हैं। यह मिट्टी के लिए बहुत लाभदायक होती है और पौधों की वृद्धि को बढ़ाती है।

सिंचाई (Irrigation)

निश्चित समयांतराल पर खेतों में पानी देने की प्रक्रिया को सिंचाई कहा जाता है। फसलों की अच्छी वृद्धि के लिए सिंचाई अत्यंत आवश्यक होती है।

सिंचाई के स्रोत (Sources of Irrigation)

सिंचाई के लिए जल विभिन्न स्रोतों से प्राप्त किया जाता है, जैसे –

●    कुएँ

●    तालाब

●    नदियाँ

●    बाँध

●    नहर

●    ट्यूबवेल

इन स्रोतों की सहायता से खेतों तक पानी पहुँचाया जाता है, जिससे फसलें स्वस्थ रूप से बढ़ती हैं।

सिंचाई के परंपरागत स्रोत (Traditional Sources of Irrigation)

सिंचाई के लिए जल विभिन्न स्रोतों से प्राप्त किया जाता है। इन स्रोतों को मुख्य रूप से दो वर्गों में बाँटा जाता है –

1. प्राथमिक स्रोत (Primary Sources)

2. द्वितीयक स्रोत (Secondary Sources)

प्राथमिक जल स्रोत (Primary Sources of Water)

प्राकृतिक रूप से जल तीन रूपों में पाया जाता है –

1. जल (Liquid Water)

2. जलवाष्प (Water Vapour)

     3. बर्फ (Ice)

जल के मुख्य प्राकृतिक स्रोत वर्षा और हिमपात हैं। वर्षा तथा हिमपात से प्राप्त जल समय-समय पर अपनी भौतिक अवस्था बदलता रहता है। यही जल नदियों, तालाबों, झीलों तथा भूमिगत जल के रूप में संग्रहित होकर सिंचाई के कार्य में उपयोग किया जाता है।

प्राकृतिक जल स्रोत कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि इन्हीं से खेतों को पानी प्राप्त होता है।

जल के द्वितीयक स्रोत (Secondary Sources of Water)

विभिन्न कार्यों, विशेष रूप से सिंचाई के लिए, जल प्राप्त करने के मुख्य साधन द्वितीयक स्रोत होते हैं। ये स्रोत प्राकृतिक जल को संग्रहित करके उपयोग के योग्य बनाते हैं।

जलीय चक्र (Water Cycle)

प्रकृति में जल निरंतर एक चक्र के रूप में घूमता रहता है, जिसे जलीय चक्र कहा जाता है। सूर्य की गर्मी से जल वाष्प बनकर ऊपर उठता है, बादल बनते हैं और फिर वर्षा या हिमपात के रूप में पृथ्वी पर वापस आता है।

इसी प्रक्रिया के विभिन्न चरणों से होकर जल हमें अलग-अलग स्रोतों से प्राप्त होता है।

जल के स्रोतों के प्रकार

जल के स्रोतों को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जाता है:

1. सतही स्रोत एवं सतही जल (Surface Sources and Surface Water)

पृथ्वी की सतह पर पाए जाने वाले जल को सतही जल कहते हैं। इसके मुख्य स्रोत हैं |

●    नदियाँ

●    तालाब

●    झीलें

●    बाँध

●    नहरें

इन स्रोतों का उपयोग सिंचाई, पेयजल तथा अन्य कार्यों के लिए किया जाता है।

2. भूमिगत स्रोत एवं भूमिगत जल (Groundwater Sources and Groundwater)

भूमि के नीचे संग्रहित जल को भूमिगत जल कहते हैं। यह जल वर्षा के पानी के भूमि में रिसने से बनता है।

भूमिगत जल प्राप्त करने के मुख्य स्रोत हैं –

●    कुएँ

●    ट्यूबवेल

●    हैंडपंप

भूमिगत जल कृषि और दैनिक जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

सतही स्रोत एवं सतही जल (Surface Sources and Surface Water)

वर्षा तथा हिमपात से प्राप्त जल का कुछ भाग वाष्प बनकर वातावरण में चला जाता है, कुछ भाग भूमि में रिसकर भूमिगत जल में मिल जाता है, जबकि शेष बड़ा भाग भूमि की सतह पर बहता या एकत्रित रहता है। इसी जल को सतही जल कहा जाता है।

सतही जल के कई स्रोत होते हैं, जिनमें से कुछ मुख्य निम्न हैं –

1. नदियाँ (Rivers)

नदियाँ सतही जल का सबसे बड़ा स्रोत हैं। वर्षा तथा बर्फ के पिघलने से प्राप्त जल पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति के अनुसार निम्न स्थानों की ओर बहने लगता है और धारा का रूप धारण कर लेता है। यही धारा आगे चलकर नदी बन जाती है।

कुछ नदियों में केवल वर्षा ऋतु के समय ही जल बहता है। ऐसी नदियों को मौसमी नदियाँ कहा जाता है।

इसके विपरीत कुछ नदियों में पूरे वर्ष जल उपलब्ध रहता है, हालांकि मौसम के अनुसार जल की मात्रा घटती-बढ़ती रहती है। ये नदियाँ कृषि, सिंचाई तथा मानव जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं।

नदियाँ

2. तालाब (Ponds)

भूमि की सतह पर प्राकृतिक अथवा कृत्रिम रूप से बने गड्ढों और निचले स्थानों में वर्षा का जल एकत्रित हो जाता है, जिन्हें तालाब कहा जाता है।

तालाबों में जल की मात्रा सामान्यतः कम होती है, इसलिए सिंचाई की दृष्टि से इनका महत्व सीमित माना जाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों का उपयोग मुख्य रूप से –

●    पशुओं को नहलाने,

●    पानी पिलाने,

●    कपड़े धोने,

●    तथा घरेलू कार्यों के लिए किया जाता है।

तालाब

3. झीलें (Lakes)

पहाड़ी क्षेत्रों में भूमि की सतह बहुत ऊँची-नीची होती है। कुछ स्थानों पर गहरी ढलान तथा चारों ओर ऊँचे पर्वत या भूमि होती है। ऐसे निचले स्थानों में वर्षा तथा झरनों का जल एकत्रित हो जाता है, जिससे झील का निर्माण होता है।

प्रकृति में कई बड़ी-बड़ी झीलें पाई जाती हैं। कुछ झीलों का निर्माण भूकम्प के कारण भूमि के धँसने से भी हुआ है।

बड़ी झीलें अपने आसपास के क्षेत्रों में जल आपूर्ति तथा सिंचाई के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं।

झीलें

भूमिगत पानी को ऊपर लाने की कई विधियाँ हैं जिनमें कुछ प्रमुख निम्न है –

1. कुएँ (Wells)

भूमिगत जल को प्राप्त करने के लिए पृथ्वी की सतह से जलग्राही परत तक एक गहरा और बड़ा छिद्र बनाया जाता है, जिसे कुआँ कहा जाता है।

कुएँ से पानी निकालने के लिए उसके ऊपर घिरनी लगाई जाती है, जिसकी सहायता से बाल्टी द्वारा पानी ऊपर लाया जाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में कुएँ प्राचीन समय से जल प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण साधन रहे हैं। इनका उपयोग सिंचाई, पीने तथा घरेलू कार्यों के लिए किया जाता है।

कुएँ

2. नलकूप या ट्यूबवेल (Tube Well)

नलकूप अथवा ट्यूबवेल भूमिगत जल प्राप्त करने का एक प्रमुख साधन है। वर्तमान समय में इसका उपयोग बड़े पैमाने पर किया जाता है।

ट्यूबवेल की सहायता से भूमिगत जल को पाइप और पंप के माध्यम से ऊपर लाया जाता है। इसका उपयोग घरेलू जल आपूर्ति, सिंचाई तथा औद्योगिक कार्यों के लिए किया जाता है।

जिन क्षेत्रों में नहरों की सुविधा उपलब्ध नहीं होती, वहाँ सिंचाई के लिए ट्यूबवेल सबसे महत्वपूर्ण साधन माना जाता है।

ट्यूबवेल से कम समय में अधिक मात्रा में पानी प्राप्त किया जा सकता है, इसलिए आधुनिक कृषि में इसका विशेष महत्व है।

नलकूप या ट्यूबवेल

3. पाताल तोड़ कुएँ (Artesian Wells)

प्रकृति में अनेक ऐसे स्थान पाए जाते हैं, जहाँ पाताल तोड़ कुओं के निर्माण के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ होती हैं।

इन कुओं में भूमिगत जल अत्यधिक दबाव में होता है। जब पृथ्वी की सतह तक छेद किया जाता है, तो पानी स्वयं ऊपर आने लगता है। ऐसे कुओं को पाताल तोड़ कुएँ कहा जाता है।

इनका उपयोग मुख्य रूप से सिंचाई तथा जल आपूर्ति के लिए किया जाता है।

पाताल तोड़ कुएँ